Rajeev kumar

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लेखनी कहानी -10-Feb-2023

ताबीज


मन को गहरा आघात लगा था। स्थिति अनुकूल न होकर प्रतिकुल हो गयी थी। मन को मसोसने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा था। वह रह-रह कर अपने दुर्भाग्य को कोस रहा था।
फकीर ने आवाज लगाई ’’ किस सोच में डुबा है बच्चा ?’’
महेश ने गर्दन उठा कर देखा और कहा ’’ जाइए अपना काम कीजिए। ’’ महेश को बोल कर बुरा लगा मगर फकीर को सुन कर बूरा नहीं लगा। फकीर ने फिर पुछा ’’ तुम अपनी परेशानी बताओ बच्चा। ’’
महेश ने अपनी जेब टटोली और कहा ’’ आपको देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। ’’
’’ नहीं, एक चीज है तुम दे सकते हो। ’’ फकीर ने कहा।
’’ वो क्या ? ’’
’’ अपनी परेशानी। ’’
फकीर की इस बात पर महेश ने कहा ’’ जाइए बाबा, परेशान मत कीजिए। ’’
फकीर ने एक ताबीज दी और कहा ’’ इसको बाँह में बांध लो। ’’
’’इससे क्या होगा ? ’’
’’ इससे तुम्हारा हौसला बुलंद हो जाएगा। ’’ फकीर ने कहा
महेश ने मन ही मन सोचा कि ’’ हौसला की क्या मजाल ? और ताबीज का क्या फायदा ? ’’
उपरी मन से ही सही महेश ने ताबीज को धारण किया और गन्ने के रस की दुकान खोली।
कर्जदार बना कर हौसला जन्मा था। हौसला ग्राहक के इन्तजार में टुटने ही वाला था उसके ताबीज निकाल कर फंेकने से पहले उम्मीद का जन्म हो गया, अब तो हौसले का सीना और भी मजबूत हो गया। हौसला और उम्मीद ने मिलकर इन्तजार को जन्म दिया और इन्तजार ने तोहफा के रूप में ढेर सारे ग्राहक दिए।
स्थिति सुदृढ़ हो जाने के बाद महेश फकीर बाबा को ढुंढने निकला मगर वो रमता जोगी कहींे नज़र नहीं आए।

समाप्त

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5 Comments

Gunjan Kamal

13-Feb-2023 11:41 AM

शानदार

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अदिति झा

11-Feb-2023 12:02 PM

Nice 👌

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Varsha_Upadhyay

10-Feb-2023 08:55 PM

Nice 👍🏼

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